ऋग्वेद (मंडल 3)
पि॒त्रे चि॑च्चक्रुः॒ सद॑नं॒ सम॑स्मै॒ महि॒ त्विषी॑मत्सु॒कृतो॒ वि हि ख्यन् । वि॒ष्क॒भ्नन्तः॒ स्कम्भ॑नेना॒ जनि॑त्री॒ आसी॑ना ऊ॒र्ध्वं र॑भ॒सं वि मि॑न्वन् ॥ (१२)
अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने पालक इंद्र के लिए प्रकाशपूर्ण उत्तम स्थान बनाया था. उत्तम यज्ञकर्म करने वाले उन लोगों ने इंद्र के लिए उचित स्थान भली प्रकार दिखा दिया था. यज्ञ मंडप में बैठे हुए उन लोगों ने विश्वजनक धरती एवं आकाश को अंतरिक्षरूपी खंभे से रोककर वेगशाली इंद्र को स्वर्ग में स्थित किया. (१२)
The Angiragotrian sages had created a bright perfect place for Spinach Indra. Those who performed the best yajnakarma had shown the proper place for Indra. Sitting in the yajna mandap, they stopped the world-giving earth and the sky from the space-like pole and placed the fast indra in heaven. (12)