ऋग्वेद (मंडल 3)
आ भन्द॑माने उ॒षसा॒ उपा॑के उ॒त स्म॑येते त॒न्वा॒३॒॑ विरू॑पे । यथा॑ नो मि॒त्रो वरु॑णो॒ जुजो॑ष॒दिन्द्रो॑ म॒रुत्वा॑ँ उ॒त वा॒ महो॑भिः ॥ (६)
भली प्रकार स्तुत रात व दिन परस्पर मिलकर या अलग-अलग होकर प्रकाश रूपी शरीर से आवें. वे धरती और आकाश को उस तेज से युक्त करें, जिससे मित्र, वरुण एवं इंद्र हम पर कृपा करते हैं. (६)
The well-versed night and day should come together or separately from the light body. May they fill the earth and the sky with the glory that friends, Varuna and Indra, have mercy on us. (6)