हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.48.1

मंडल 3 → सूक्त 48 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
स॒द्यो ह॑ जा॒तो वृ॑ष॒भः क॒नीनः॒ प्रभ॑र्तुमाव॒दन्ध॑सः सु॒तस्य॑ । सा॒धोः पि॑ब प्रतिका॒मं यथा॑ ते॒ रसा॑शिरः प्रथ॒मं सो॒म्यस्य॑ ॥ (१)
जलवर्षक, तुरंत उत्पन्न एवं कमनीय इंद्र हवि-सहित सोमरस धारण करने वाले यजमान की रक्षा करें. हे इंद्र! समय-समय पर सोमपान की इच्छा होने पर तुम सब देवों से पहले ही गोदुग्ध-मिश्रित सोम पिओ. (१)
Protect the host holding the Somras with water year, the immediately generated and commissible Indra Havi. O Indra! From time to time, if you desire sompan, drink the god-mixed mons before all the gods. (1)