ऋग्वेद (मंडल 3)
मि॒त्रो जना॑न्यातयति ब्रुवा॒णो मि॒त्रो दा॑धार पृथि॒वीमु॒त द्याम् । मि॒त्रः कृ॒ष्टीरनि॑मिषा॒भि च॑ष्टे मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत ॥ (१)
स्तुति किए जाने पर मित्र देव सभी लोगों को खेती आदि कामों में लगा देते हैं. वे धरती और आकाश दोनों को धारण करते हैं एवं यज्ञकर्म करने वालों को भली प्रकार देखते हैं. घी मिला हुआ हव्य मित्र के लिए हवन करो. (१)
When praised, the friend God puts all the people in farming etc. They hold both the earth and the sky and see well those who perform the sacrificial work. Do the havan for the ghee mixed havan friend. (1)
ऋग्वेद (मंडल 3)
प्र स मि॑त्र॒ मर्तो॑ अस्तु॒ प्रय॑स्वा॒न्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति व्र॒तेन॑ । न ह॑न्यते॒ न जी॑यते॒ त्वोतो॒ नैन॒मंहो॑ अश्नो॒त्यन्ति॑तो॒ न दू॒रात् ॥ (२)
हे आदित्य देव! जो गाय का घृत लेकर तुम्हें हव्य देता है, वह मनुष्य अन्न का स्वामी बने. तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे न कोई नष्ट कर सकता है और न हरा सकता है. उसे पास से या दूर से पाप भी नहीं छू सकता. (२)
O Aditya Dev! The man who takes the abomination of the cow and gives you the gift, let the man be the master of the food. No one can destroy or defeat what you protect. He cannot even touch sin from near or from a distance. (2)
ऋग्वेद (मंडल 3)
अ॒न॒मी॒वास॒ इळ॑या॒ मद॑न्तो मि॒तज्ञ॑वो॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्याः । आ॒दि॒त्यस्य॑ व्र॒तमु॑पक्षि॒यन्तो॑ व॒यं मि॒त्रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म ॥ (३)
हे मित्र! निरोग एवं अन्न के कारण प्रसन्न हम धरती के विस्तृत भाग में घुटने टेककर इच्छानुसार चलते हुए आदित्य के यज्ञ के समीप निवास करते है. हम लोग आदित्य की कृपादृष्टि में रहें. (३)
Oh my friend! Happy because of the healthy and the food, we kneel down in a wide part of the earth and live near Aditya's yajna by walking according to the will. Let us be in aditya's grace. (3)
ऋग्वेद (मंडल 3)
अ॒यं मि॒त्रो न॑म॒स्यः॑ सु॒शेवो॒ राजा॑ सुक्ष॒त्रो अ॑जनिष्ट वे॒धाः । तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥ (४)
सबके नमस्कार करने योग्य, सुख से सेव्य, सर्व जगत् के स्वामी, शोभन बलयुक्त एवं सबके विधाता सूर्य उत्पन्न हुए हैं. उन यज्ञपात्र सूर्य की अनुग्रह बुद्धि तथा कल्याण करने वाली मित्रता का हम पावें. (४)
The sun has been born to greet everyone, to be happy, to be the lord of all the world, to be strong and to all. Let us find the grace of those sacrificial suns, wisdom and the friendship of goodness. (4)
ऋग्वेद (मंडल 3)
म॒हाँ आ॑दि॒त्यो नम॑सोप॒सद्यो॑ यात॒यज्ज॑नो गृण॒ते सु॒शेवः॑ । तस्मा॑ ए॒तत्पन्य॑तमाय॒ जुष्ट॑म॒ग्नौ मि॒त्राय॑ ह॒विरा जु॑होत ॥ (५)
महान् आदित्य लोगों को अपने-अपने कर्म में लगाने वाले एवं नमस्कार द्वारा सेवा करने योग्य हैं. वे स्तुति करने वालों के प्रति प्रसन्न होते हैं. उन अत्यंत स्तुति योग्य मित्र के निमित्त अग्नि में हव्य डालो. (५)
The great Aditya is able to serve people through those who engage in their deeds and greet them. They are pleased with those who praise. Pour the wind into the agni for the sake of those most praiseworthy friends. (5)
ऋग्वेद (मंडल 3)
मि॒त्रस्य॑ चर्षणी॒धृतोऽवो॑ दे॒वस्य॑ सान॒सि । द्यु॒म्नं चि॒त्रश्र॑वस्तमम् ॥ (६)
वर्षा द्वारा मनुष्यों का पालन करने वाले मित्र का अन्न सबके द्वारा भोगयोग्य एवं उनका धन अतिशय कीर्तियुक्त है. (६)
The food of a friend who follows human beings by the rain is enjoyable by all and their wealth is very rich. (6)
ऋग्वेद (मंडल 3)
अ॒भि यो म॑हि॒ना दिवं॑ मि॒त्रो ब॒भूव॑ स॒प्रथाः॑ । अ॒भि श्रवो॑भिः पृथि॒वीम् ॥ (७)
जिस मित्र ने अपनी महिमा से अंतरिक्ष को हरा दिया है, उसी कीर्तिशाली ने धरती को अन्न से भली प्रकार पूर्ण किया है. (७)
The friend who has defeated the space with his glory, the same rich man has made the earth well full with food. (7)
ऋग्वेद (मंडल 3)
मि॒त्राय॒ पञ्च॑ येमिरे॒ जना॑ अ॒भिष्टि॑शवसे । स दे॒वान्विश्वा॑न्बिभर्ति ॥ (८)
ब्राह्मण आदि पांच जन शत्रुओं को हराने वाले बल से युक्त मित्र के लिए हवि देते हैं. वे मित्र सभी देवों को धारण करते हैं. (८)
Brahmins, etc., give a greeting to a friend with the force of defeating the five people's enemies. Those friends hold all the gods. (8)