हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.60.2

मंडल 3 → सूक्त 60 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
याभिः॒ शची॑भिश्चम॒साँ अपिं॑शत॒ यया॑ धि॒या गामरि॑णीत॒ चर्म॑णः । येन॒ हरी॒ मन॑सा नि॒रत॑क्षत॒ तेन॑ देव॒त्वमृ॑भवः॒ समा॑नश ॥ (२)
हे ऋभुओ! जिस शक्ति द्वारा तुमने चमस के चार भाग किए थे, जिस बुद्धि से तुमने गाय को चर्मयुक्त किया था एवं जिस ज्ञान से तुमने इंद्र के हरि नामक घोड़ों को बनाया, उन्हीं कर्मो द्वारा तुमने देवत्व पाया है. (२)
Hey, Lord! The power by which you made the four parts of the chamas, the wisdom with which you made the cow, and the knowledge with which you made the horses called Hari of Indra, you have attained divinity through these deeds. (2)