हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.2.13

मंडल 4 → सूक्त 2 → श्लोक 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 2
त्वम॑ग्ने वा॒घते॑ सु॒प्रणी॑तिः सु॒तसो॑माय विध॒ते य॑विष्ठ । रत्नं॑ भर शशमा॒नाय॑ घृष्वे पृ॒थु श्च॒न्द्रमव॑से चर्षणि॒प्राः ॥ (१३)
हे अतिशय युवा, दीप्तियुक्त, मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं उत्तर वेदी पर स्थापित करने योग्य अग्नि! सोम निचोड़ने वाले व तुम्हारी सेवा तथा स्तुति करने वाले यजमान की रक्षा के लिए उसे अधिक मात्रा में आनंददायक एवं उत्तम धन दो. (१३)
O very young, radiant, fulfilling the desire of men and a agni that is set on the north altar! Give him a greater amount of pleasant and good money to protect the host who squeezes som and serves and praises you. (13)