ऋग्वेद (मंडल 4)
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम् । तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे ॥ (१३)
हे इंद्र! यद्यपि तुम बहुत से यजमानों के साधारण देव हो, फिर भी हम तुम्हें बुलाते हैं. (१३)
O Indra! Even though you are the ordinary god of many hosts, we still call you. (13)