हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.37.2

मंडल 4 → सूक्त 37 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 37
ते वो॑ हृ॒दे मन॑से सन्तु य॒ज्ञा जुष्टा॑सो अ॒द्य घृ॒तनि॑र्णिजो गुः । प्र वः॑ सु॒तासो॑ हरयन्त पू॒र्णाः क्रत्वे॒ दक्षा॑य हर्षयन्त पी॒ताः ॥ (२)
आज हमारे वे सभी यज्ञ तुम्हारे मन को प्रसन्न करने वाले बनें एवं घी से मिला हुआ सोमरस तुम्हें प्राप्त हो. चमस में भरा हुआ सोमरस तुम्हारी इच्छा करता है. वह पीने के पश्चात्‌ तुम्हे यज्ञकर्म के लिए प्रेरित करे. (२)
Today, let all those sacrifices of ours be pleasing to your mind and you get the somras mixed with ghee. Sommers stuffed in a spoon makes your wish. He should inspire you to perform yajnakarma after drinking. (2)