हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.40.5

मंडल 4 → सूक्त 40 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 40
हं॒सः शु॑चि॒षद्वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत् । नृ॒षद्व॑र॒सदृ॑त॒सद्व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जा ऋ॑त॒जा अ॑द्रि॒जा ऋ॒तम् ॥ (५)
सूर्य दीप्तिशाली आकाश में रहते हैं. वायु अंतरिक्ष में निवास करते हैं. होता वेदी पर स्थित रहते हैं. अतिथि घर में निवास करते हैं. ऋत मनुष्यों में, उत्तम स्थान में, यज्ञ में एवं आकाश में निवास करते हैं तथा जल, सूर्यकिरणों, सत्य एवं पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं. (५)
The sun lives in the bright sky. Air inhabits space. Would remain located on the altar. Guests reside in the house. The rite dwells in human beings, in the best place, in the yagna and in the sky, and in the water, the sunshine, the truth, and the mountains. (5)