ऋग्वेद (मंडल 4)
नि॒र्यु॒वा॒णो अश॑स्तीर्नि॒युत्वा॒ँ इन्द्र॑सारथिः । वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ ॥ (२)
हे वायु! तुम सभी प्रशंसाओं से युक्त, घोड़ों के स्वामी एवं इंद्र के सहायक बनकर अपने अन्नदाता रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (२)
O air! You, with all the praises, come to drink the som through your annadata rath, as the lord of the horses and the helper of Indra. (2)