हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
यस्त॒स्तम्भ॒ सह॑सा॒ वि ज्मो अन्ता॒न्बृह॒स्पति॑स्त्रिषध॒स्थो रवे॑ण । तं प्र॒त्नास॒ ऋष॑यो॒ दीध्या॑नाः पु॒रो विप्रा॑ दधिरे म॒न्द्रजि॑ह्वम् ॥ (१)
यज्ञ का पालन करने वाले एवं शब्द के द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दसों दिशाओं को स्थिर किया है. प्रसन्रतादायक जीभ वाले बृहस्पतियों को प्राचीन ऋषियों एवं मेधावियों ने सबसे आगे स्थापित किया था. (१)
Jupiter, who follows the yajna and in all the three places through the word, has stabilized the ten directions with his power. Jupiters with a pleasant tongue were established at the forefront by ancient sages and meritorious people. (1)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
धु॒नेत॑यः सुप्रके॒तं मद॑न्तो॒ बृह॑स्पते अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे । पृष॑न्तं सृ॒प्रमद॑ब्धमू॒र्वं बृह॑स्पते॒ रक्ष॑तादस्य॒ योनि॑म् ॥ (२)
हे शोभन बुद्धि वाले बृहस्पति! तुम उन ऋत्विजों के लिए फलदाता, उन्नति करने वाले एवं अहिंसक बनकर उनके विशाल यज्ञ की रक्षा करते हो जो तुम्हें प्रसन्न करते हैं, तुम्हारी स्तुति करते हैं एवं जिनके चलने से शन्रु कांप उठते हैं. (२)
O Jupiter with golden intelligence! You protect the great sacrifice of those ritvijas by being fruitful, progressive and non-violent, who please you, praise you and whose walk makes shanru tremble. (2)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
बृह॑स्पते॒ या प॑र॒मा प॑रा॒वदत॒ आ त॑ ऋत॒स्पृशो॒ नि षे॑दुः । तुभ्यं॑ खा॒ता अ॑व॒ता अद्रि॑दुग्धा॒ मध्वः॑ श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम् ॥ (३)
हे बृहस्पति! तुम्हारे यज्ञ में आने वाले अश्व परम उच्च स्थान स्वर्ग से आते हैं. जिस प्रकार खोदे हुए कुएं में चारों ओर से धाराएं निकलती हैं, उसी प्रकार पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोमरस स्तुतियों के साथ तुम्हें गीला बनावें. (३)
O Jupiter! The horses that come to your yajna come from heaven, the highest place. Just as streams come out from all sides in a dug well, so make you wet with someras eulogies squeezed with the help of stones. (3)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
बृह॒स्पतिः॑ प्रथ॒मं जाय॑मानो म॒हो ज्योति॑षः पर॒मे व्यो॑मन् । स॒प्तास्य॑स्तुविजा॒तो रवे॑ण॒ वि स॒प्तर॑श्मिरधम॒त्तमां॑सि ॥ (४)
बृहस्पति महान्‌ दीप्तिशाली सूर्य के विशाल आकाश में जब पहली बार उत्पन्न हुए थे, तब उन्होंने सात मुख वाला, अनेक प्रकार का रूप धारण करके, शब्दयुक्त एवं गतिशील तेज से एकाकार होकर अंधकार का नाश किया था. (४)
When Jupiter was first born in the vast sky of the great bright sun, he destroyed darkness by taking seven faces, taking many types of forms, uniting with wordy and moving radiance. (4)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
स सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण । बृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द्वाव॑शती॒रुदा॑जत् ॥ (५)
बृहस्पति ने शोभन स्तुति करने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अंगिराओं के साथ मिलकर शब्द करते हुए बल नामक असुर को नष्ट किया था एवं शब्द करते हुए ही हव्य की प्रेरणा करने वाली र॑भाती हुई गायों को बाहर निकाला था. (५)
Jupiter, along with shobhan praising and luminous angiras, had destroyed the asura named Bal while wording and while saying the word, he took out the cows that inspired Eve. (5)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
ए॒वा पि॒त्रे वि॒श्वदे॑वाय॒ वृष्णे॑ य॒ज्ञैर्वि॑धेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑ । बृह॑स्पते सुप्र॒जा वी॒रव॑न्तो व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ (६)
हम लोग इसी तरह पालक, सब देवों के प्रतिनिधि एवं कामवर्षी बृहस्पति की सेवा हव्य, यज्ञों एवं स्तुतियों द्वारा करेंगे. हे बृहस्पति! इस प्रकार हम उत्तम संतान एवं वीर सैनिकों सहित धन के स्वामी हो सकेंगे. (६)
In the same way, we will serve the guardian, representatives of all gods and the work-year-old Jupiter through sacrifices, sacrifices and praises. O Jupiter! In this way, we will be able to be the masters of wealth including good children and brave soldiers. (6)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
स इद्राजा॒ प्रति॑जन्यानि॒ विश्वा॒ शुष्मे॑ण तस्थाव॒भि वी॒र्ये॑ण । बृह॒स्पतिं॒ यः सुभृ॑तं बि॒भर्ति॑ वल्गू॒यति॒ वन्द॑ते पूर्व॒भाज॑म् ॥ (७)
वही राजा अपनी शक्ति के द्वारा सभी शत्रुओं के बल को हराता है जो बृहस्पति का भली प्रकार भरण-पोषण करता है और सर्वप्रथम भाग पाने वाले के रूप में उनकी स्तुति करता है. (७)
The king, who foremost praises Jupiter well, defeats the strength of all the enemies through his power (7)

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
स इत्क्षे॑ति॒ सुधि॑त॒ ओक॑सि॒ स्वे तस्मा॒ इळा॑ पिन्वते विश्व॒दानी॑म् । तस्मै॒ विशः॑ स्व॒यमे॒वा न॑मन्ते॒ यस्मि॑न्ब्र॒ह्मा राज॑नि॒ पूर्व॒ एति॑ ॥ (८)
वही राजा भली प्रकार तृप्त होकर अपने घर में रहता है, धरती उसे सभी कालों में फलों से बढ़ाती है एवं प्रजाएं अपने आप उसके सामने झुकी रहती हैं, जिस राजा के समीप ब्रह्मा सबसे पहले जाते हैं. (८)
The king who lives in his house well satisfied, the earth increases him with fruits in all times and the subjects automatically bow before him, the king to whom Brahma goes first. (8)
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