हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.50.2

मंडल 4 → सूक्त 50 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 50
धु॒नेत॑यः सुप्रके॒तं मद॑न्तो॒ बृह॑स्पते अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे । पृष॑न्तं सृ॒प्रमद॑ब्धमू॒र्वं बृह॑स्पते॒ रक्ष॑तादस्य॒ योनि॑म् ॥ (२)
हे शोभन बुद्धि वाले बृहस्पति! तुम उन ऋत्विजों के लिए फलदाता, उन्नति करने वाले एवं अहिंसक बनकर उनके विशाल यज्ञ की रक्षा करते हो जो तुम्हें प्रसन्न करते हैं, तुम्हारी स्तुति करते हैं एवं जिनके चलने से शन्रु कांप उठते हैं. (२)
O Jupiter with golden intelligence! You protect the great sacrifice of those ritvijas by being fruitful, progressive and non-violent, who please you, praise you and whose walk makes shanru tremble. (2)