हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.51.2

मंडल 4 → सूक्त 51 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
अस्थु॑रु चि॒त्रा उ॒षसः॑ पु॒रस्ता॑न्मि॒ता इ॑व॒ स्वर॑वोऽध्व॒रेषु॑ । व्यू॑ व्र॒जस्य॒ तम॑सो॒ द्वारो॒च्छन्ती॑रव्र॒ञ्छुच॑यः पाव॒काः ॥ (२)
यज्ञों में गाड़े गए खंभों के समान सुंदर एवं रंग-बिरंगी उषाएं पूर्व दिशा को घेरकर स्थित होती हैं. उषाएं बाधा डालने वाले अंधकार का द्वार खोलती हुई दीप्तियुक्त एवं पवित्र बनकर चमकती हैं. (२)
Like the pillars buried in the Yagya, beautiful and colorful lights surround the east direction. Ushas (mornings) shine bright and pure, opening the door of obstructing darkness. (2)