हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.51.3

मंडल 4 → सूक्त 51 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
उ॒च्छन्ती॑र॒द्य चि॑तयन्त भो॒जान्रा॑धो॒देया॑यो॒षसो॑ म॒घोनीः॑ । अ॒चि॒त्रे अ॒न्तः प॒णयः॑ सस॒न्त्वबु॑ध्यमाना॒स्तम॑सो॒ विम॑ध्ये ॥ (३)
आज अंधकार का नाश करती हुई एवं धन की स्वामिनी उषाएं भोजन देने वाले यजमानों को सोमरस आदि दान करने के हेतु उत्साहित करती हैं. चेतनारहित गाढ़े अंधकार में दान न देने वाले पणि लोग चेतनारहित होकर पड़े रहे. (३)
Today, destroying darkness and the owner of wealth, Ushas encourages the food-givers to donate somersaults etc. In the thick darkness without consciousness, the sages who did not give charity remained lying unconscious. (3)