ऋग्वेद (मंडल 4)
तद्दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्वार्यं॑ म॒हद्वृ॑णी॒महे॒ असु॑रस्य॒ प्रचे॑तसः । छ॒र्दिर्येन॑ दा॒शुषे॒ यच्छ॑ति॒ त्मना॒ तन्नो॑ म॒हाँ उद॑यान्दे॒वो अ॒क्तुभिः॑ ॥ (१)
हम बलशाली एवं उत्तम बुद्धि वाले सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिस धन को वे हव्य देने वाले यजमान को अपने आप देते हैं. महान् सविता वह धन हमें प्रदान करें. (१)
We pray for the golden and revered wealth of the mighty and well-intentioned Savita Dev, the wealth that he himself gives to the host who gives the havan. The great Savita gives us that wealth. (1)