ऋग्वेद (मंडल 4)
तद्दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्वार्यं॑ म॒हद्वृ॑णी॒महे॒ असु॑रस्य॒ प्रचे॑तसः । छ॒र्दिर्येन॑ दा॒शुषे॒ यच्छ॑ति॒ त्मना॒ तन्नो॑ म॒हाँ उद॑यान्दे॒वो अ॒क्तुभिः॑ ॥ (१)
हम बलशाली एवं उत्तम बुद्धि वाले सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिस धन को वे हव्य देने वाले यजमान को अपने आप देते हैं. महान् सविता वह धन हमें प्रदान करें. (१)
We pray for the golden and revered wealth of the mighty and well-intentioned Savita Dev, the wealth that he himself gives to the host who gives the havan. The great Savita gives us that wealth. (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
दि॒वो ध॒र्ता भुव॑नस्य प्र॒जाप॑तिः पि॒शङ्गं॑ द्रा॒पिं प्रति॑ मुञ्चते क॒विः । वि॒च॒क्ष॒णः प्र॒थय॑न्नापृ॒णन्नु॒र्वजी॑जनत्सवि॒ता सु॒म्नमु॒क्थ्य॑म् ॥ (२)
स्वर्ग एवं अन्य सब लोकों को धारण करने वाले, प्रजाओं का पालन करने वाले एवं कवि सविता देव पीले रंग का कवच पहनते हैं. अनेक प्रकार से देखने वाले सविता प्रसिद्ध होकर भी जगत् को तेज से भरते हुए चलते हैं एवं प्रशंसा के योग्य सुख उत्पन्न करते हैं. (२)
Savita Dev, who holds heaven and all other realms, follows the people and the poet, wears yellow armor. Savita, who is seen in many ways, even though she is famous, walks filling the world with speed and produces happiness worthy of praise. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आप्रा॒ रजां॑सि दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा॒ श्लोकं॑ दे॒वः कृ॑णुते॒ स्वाय॒ धर्म॑णे । प्र बा॒हू अ॑स्राक्सवि॒ता सवी॑मनि निवे॒शय॑न्प्रसु॒वन्न॒क्तुभि॒र्जग॑त् ॥ (३)
सविता देव अपने तेज द्वारा पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक को पूर्ण करते हुए अपने धारण कर्म की प्रशंसा करते हैं. वे अनुज्ञा रूप में भुजाएं फैलाते हैं एवं अपने प्रकाश से प्रतिदिन जगत् को अपने काम में लगाते है. (३)
Savita Dev praises her holding karma by completing the earthloka and the heavenly place with her brightness. They spread out their arms in the form of permission and apply the world to their work every day with their light. (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
अदा॑भ्यो॒ भुव॑नानि प्र॒चाक॑शद्व्र॒तानि॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि र॑क्षते । प्रास्रा॑ग्बा॒हू भुव॑नस्य प्र॒जाभ्यो॑ धृ॒तव्र॑तो म॒हो अज्म॑स्य राजति ॥ (४)
सविता देव अन्य प्राणियों से पराजित न होते हुए सब लोकों को प्रकाशित करते हैं एवं सभी प्राणियों के व्रत की रक्षा करते हैं. वे विश्व की प्रजाओं के कल्याण के निमित्त अपनी भुजाओं को फैलाते हैं एवं व्रत धारण करने वाले इस महान् विश्व के स्वामी हैं. (४)
Savita Dev illuminates all the realms without being defeated by other beings and protects the fast of all beings. They spread out their arms for the welfare of the people of the world and are the masters of this great world who fasts. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
त्रिर॒न्तरि॑क्षं सवि॒ता म॑हित्व॒ना त्री रजां॑सि परि॒भुस्त्रीणि॑ रोच॒ना । ति॒स्रो दिवः॑ पृथि॒वीस्ति॒स्र इ॑न्वति त्रि॒भिर्व्र॒तैर॒भि नो॑ रक्षति॒ त्मना॑ ॥ (५)
सविता देव अपने महत्त्व द्वारा सबको पराजित करते हुए तीनों अंतरिक्षों, तीनों लोकों एवं तीन तेजस्वी तत्त्वो-अग्नि, वायु और आदित्य, तीन स्वर्गो एवं तीन पृथ्वियों को व्याप्त करते हैं. वे तीन व्रतों द्वारा स्वयं हम सबका पालन करें. (५)
Savita Dev defeats everyone by her importance and encompasses the three realms, the three lokas and the three bright elements - Agni, Vayu and Aditya, three heavens and three earths. Let them follow all of us by themselves by three vows. (5)
ऋग्वेद (मंडल 4)
बृ॒हत्सु॑म्नः प्रसवी॒ता नि॒वेश॑नो॒ जग॑तः स्था॒तुरु॒भय॑स्य॒ यो व॒शी । स नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता शर्म॑ यच्छत्व॒स्मे क्षया॑य त्रि॒वरू॑थ॒मंह॑सः ॥ (६)
पर्याप्त धन के स्वामी, कर्मो की अनुज्ञा देने वाले, सबके द्वारा गंतव्य एवं स्थावर जंगम दोनों को वश में रखने वाले सविता देव हमारे तीनों लोकों में स्थित पाप के नाश के हेतु हमें कल्याण प्रदान करें. (६)
May Savita Dev, the master of sufficient wealth, the one who allows deeds, who subdues both destination and real movable by all, give us welfare for the destruction of the sin in our three realms. (6)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आग॑न्दे॒व ऋ॒तुभि॒र्वर्ध॑तु॒ क्षयं॒ दधा॑तु नः सवि॒ता सु॑प्र॒जामिष॑म् । स नः॑ क्ष॒पाभि॒रह॑भिश्च जिन्वतु प्र॒जाव॑न्तं र॒यिम॒स्मे समि॑न्वतु ॥ (७)
सविता देव ऋतुओं के साथ आवें, हमारे घरों की वृद्धि करें एवं हमें पुत्र-पौत्र से युक्त अन्न दें. वे रात और दिन हमारे प्रति प्रसन्न रहें एवं हमें पुत्र-पौत्र वाला धन प्रदान करें. (७)
May Savita Dev come with the seasons, grow our houses and give us food with sons and grandsons. May they be happy with us day and night and give us wealth with sons and grandsons. (7)