ऋग्वेद (मंडल 4)
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यः॑ । यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं॑ वि॒शेवि॑शे ॥ (१)
आफ्नवान् एवं अन्य भृगुवंशी ऋषियों ने वनों में दावाग्निरूप से दर्शनीय एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी अग्नि को प्रज्वलित किया था. वे ही देवों को बुलाने वाले, अतिशय यज्ञकर्ता, यज्ञों में ऋत्विजों द्वारा स्तुत्य एवं देवों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि यज्ञकर्तताओं द्वारा स्थापित किए गए हैं. (१)
Afnavan and other Bhriguvanshi sages had lit the agni in the forests and the lord of all the subjects. They are the ones who call the gods, the most sacrificial performers, the praises by the ritvijas in the yagyas and the best agni yajnas among the devas. (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
अग्ने॑ क॒दा त॑ आनु॒षग्भुव॑द्दे॒वस्य॒ चेत॑नम् । अधा॒ हि त्वा॑ जगृभ्रि॒रे मर्ता॑सो वि॒क्ष्वीड्य॑म् ॥ (२)
हे द्योतमान एवं मानवों द्वारा पूज्य अग्नि! तुम्हारा तेज कब गतिशील होगा? मनुष्य तुम्हें ग्रहण करते हैं. (२)
O flame and worshiped by human beings! When will your speed be dynamic? Humans accept you. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
ऋ॒तावा॑नं॒ विचे॑तसं॒ पश्य॑न्तो॒ द्यामि॑व॒ स्तृभिः॑ । विश्वे॑षामध्व॒राणां॑ हस्क॒र्तारं॒ दमे॑दमे ॥ (३)
मायारहित, विशिष्ट-ज्ञान वाले, तारों से भरे हुए आकाश के समान चिनगारियों से युक्त एवं समस्त यज्ञों की वृद्धि करने वाले अग्नि को देखते हुए ऋत्विजों ने उन्हें प्रत्येक यज्ञशाला में ग्रहण किया. (३)
In view of the agni that is without maya, with special knowledge, with sparks like a sky full of stars and increasing all the yajnas, the Ritvijas received them in every yajnashala. (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आ॒शुं दू॒तं वि॒वस्व॑तो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि । आ ज॑भ्रुः के॒तुमा॒यवो॒ भृग॑वाणं वि॒शेवि॑शे ॥ (४)
मनुष्य समस्त प्रजाओं को पराजित करने वाले, तीव्रगति, यजमान के दूत, झंडे के समान ज्ञान कराने वाले एवं दीप्तिमान् अग्नि को सभी प्रजाओं के कल्याण के लिए लाते हैं. (४)
Human beings bring the agni that defeats all subjects, speed, messengers of the host, the flag-like knowledge and the radiant agni for the welfare of all the subjects. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
तमीं॒ होता॑रमानु॒षक्चि॑कि॒त्वांसं॒ नि षे॑दिरे । र॒ण्वं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ यजि॑ष्ठं स॒प्त धाम॑भिः ॥ (५)
ऋत्विज् आदि मानवों ने प्रसिद्ध, क्रमशः देवों को बुलाने वाले, ज्ञानसंपन्न, रमणीय, पवित्र प्रकाश वाले, श्रेष्ठ यज्ञकर्ता एवं सात तेजों से युक्त अग्नि को स्थापित किया था. (५)
The famous, gradually called the gods, the knowledge-rich, delightful, the holy light, the superior yajnakar and the agni with seven radiances. (5)
ऋग्वेद (मंडल 4)
तं शश्व॑तीषु मा॒तृषु॒ वन॒ आ वी॒तमश्रि॑तम् । चि॒त्रं सन्तं॒ गुहा॑ हि॒तं सु॒वेदं॑ कूचिद॒र्थिन॑म् ॥ (६)
माता के समान जलसमूह में एवं वृक्षों में वर्तमान, सुंदर, जलने के डर से प्राणियों द्वारा असेवित, विचित्र, गुहा में छिपे हुए, शोभन धनयुक्त एवं सभी जगह हव्य की अभिलाषा करने वाले अग्नि को ऋत्विजों ने स्थापित किया था. (६)
In the water group like the mother and in the trees, the present, beautiful, unserved by the creatures for fear of burning, strange, hidden in the cavity, rich and desireing desire for desire everywhere, was established by the Ritvijas. (6)
ऋग्वेद (मंडल 4)
स॒सस्य॒ यद्वियु॑ता॒ सस्मि॒न्नूध॑न्नृ॒तस्य॒ धाम॑न्र॒णय॑न्त दे॒वाः । म॒हाँ अ॒ग्निर्नम॑सा रा॒तह॑व्यो॒ वेर॑ध्व॒राय॒ सद॒मिदृ॒तावा॑ ॥ (७)
देवगण प्रातःकाल नींद त्याग कर जल के कारणभूत यज्ञ में अग्नि को प्रसन्न करते हैं. महान्, नमस्कारपूर्वक हव्य दिए गए एवं सत्ययुक्त अग्नि सदा ही यजमानों के यज्ञों को जानें. (७)
Devgans give up sleep in the morning and please the agni in the yagya due to water. Great, salutations were given and the agni of truth always know the sacrifices of the hosts. (7)
ऋग्वेद (मंडल 4)
वेर॑ध्व॒रस्य॑ दू॒त्या॑नि वि॒द्वानु॒भे अ॒न्ता रोद॑सी संचिकि॒त्वान् । दू॒त ई॑यसे प्र॒दिव॑ उरा॒णो वि॒दुष्ट॑रो दि॒व आ॒रोध॑नानि ॥ (८)
हे विद्वान् यज्ञ के दूत, कार्यो को जानने वाले, धरती और आकाश के मध्य भाग से भली-भांति परिचित, पुरातन, थोड़े हव्य को अधिक करने में समर्थ, अतिशय विद्वान् एव देवों के दूत अग्नि! तुम देवों को हवि देने के लिए स्वर्ग की सीढ़ियों पर चढ़ते हो. (८)
O learned messengers of yajna, those who know the works, well acquainted with the middle part of the earth and the sky, ancient, capable of overdoing a little lust, the great scholar and the messenger of the gods, agni! You climb the steps of heaven to give havi to the gods. (8)