हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.7.4

मंडल 4 → सूक्त 7 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 7
आ॒शुं दू॒तं वि॒वस्व॑तो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि । आ ज॑भ्रुः के॒तुमा॒यवो॒ भृग॑वाणं वि॒शेवि॑शे ॥ (४)
मनुष्य समस्त प्रजाओं को पराजित करने वाले, तीव्रगति, यजमान के दूत, झंडे के समान ज्ञान कराने वाले एवं दीप्तिमान्‌ अग्नि को सभी प्रजाओं के कल्याण के लिए लाते हैं. (४)
Human beings bring the agni that defeats all subjects, speed, messengers of the host, the flag-like knowledge and the radiant agni for the welfare of all the subjects. (4)