हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
अ॒भ्य॑व॒स्थाः प्र जा॑यन्ते॒ प्र व॒व्रेर्व॒व्रिश्चि॑केत । उ॒पस्थे॑ मा॒तुर्वि च॑ष्टे ॥ (१)
जो अग्नि धरती-माता की गोद में स्थित पदार्थो को देखते हैं, वे ही वव्रि ऋषि की अशोभन दशाओं को जानकर दूर करें. (१)
The agnis that see the substances in the lap of the mother earth, should remove them by knowing the indecent conditions of the sage Vavi, who are. (1)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
जु॒हु॒रे वि चि॒तय॒न्तोऽनि॑मिषं नृ॒म्णं पा॑न्ति । आ दृ॒ळ्हां पुरं॑ विविशुः ॥ (२)
हे अग्नि! जो लोग तुम्हारे प्रभाव को जानते हुए सदा यज्ञ के लिए तुम्हें बुलाते हैं एवं बुलाकर स्तुतियों तथा हव्यों द्वारा तुम्हारे बल की रक्षा करते हैं, वे शत्रुओं की अगम्य नगरी में प्रवेश करते हैं. (२)
O agni! Those who, knowing your influence, always call you for the yagna and call and protect your strength by praises and sayings, enter the inaccessible city of enemies. (2)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
आ श्वै॑त्रे॒यस्य॑ ज॒न्तवो॑ द्यु॒मद्व॑र्धन्त कृ॒ष्टयः॑ । नि॒ष्कग्री॑वो बृ॒हदु॑क्थ ए॒ना मध्वा॒ न वा॑ज॒युः ॥ (३)
गले में सुवर्णालंकार धारण करने वाले, महान्‌ स्तोत्र बोलने वाले एवं अन्न के अभिलाषी संसारी लोग स्तुतियों द्वारा अंतरिक्षवर्ती विद्युत्‌-अग्नि की शक्ति बढ़ाते हैं. (३)
Worldly people who wear a golden lamp in their necks, speak great hymns and desire food enhance the power of the space-powered electric agni by praises. (3)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
प्रि॒यं दु॒ग्धं न काम्य॒मजा॑मि जा॒म्योः सचा॑ । घ॒र्मो न वाज॑जठ॒रोऽद॑ब्धः॒ शश्व॑तो॒ दभः॑ ॥ (४)
दूध से मिले हुए हव्य अन्न को उदर में रखने वाले, शत्रुओं द्वारा अहिसित एवं सदा शत्रुओं की हिंसा करने वाले अग्नि धरती और आकाश के सहायक होकर हमारे कमनीय एवं दूध के समान प्रिय स्तोत्र को सुनें. (४)
Listen to our commissible and milk-like beloved hymns by the help of the agni earth and the sky, who keep the food mixed with milk in the stomach, unbelieved by the enemies and the violence of the enemies. (4)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 19
क्रीळ॑न्नो रश्म॒ आ भु॑वः॒ सं भस्म॑ना वा॒युना॒ वेवि॑दानः । ता अ॑स्य सन्धृ॒षजो॒ न ति॒ग्माः सुसं॑शिता व॒क्ष्यो॑ वक्षणे॒स्थाः ॥ (५)
हे दीप्तिशाली एवं वनों में अपनी ज्वाला से बनी भस्म द्वारा क्रीड़ा करते हुए अग्नि! तुम प्रेरक वायु द्वारा ज्ञात होकर हमारे सामने आओ. तुम्हारी शत्रुनाशक ज्वालाएं हमारे समीप आकर कोमल बनें. (५)
O agni in the forests, playing with the ashes made of its flames! You come before us by being known by the inductive wind. Let your hostile flames come near us and become gentle. (5)