ऋग्वेद (मंडल 5)
अग्ने॒ सह॑न्त॒मा भ॑र द्यु॒म्नस्य॑ प्रा॒सहा॑ र॒यिम् । विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भ्या॒३॒॑सा वाजे॑षु सा॒सह॑त् ॥ (१)
हे अग्नि! मुझ द्युम्न ऋषि को उत्तम बल से युक्त एवं शत्रुओं को पराजित करने वाला पुत्र दो, जो स्तुति से युक्त होकर युद्ध में सामने आने वाले शत्रुओं को हरा दे. (१)
O agni! Give me a son of the sage with the best power and defeating the enemies, who will be praised and defeat the enemies who come to war. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
तम॑ग्ने पृतना॒षहं॑ र॒यिं स॑हस्व॒ आ भ॑र । त्वं हि स॒त्यो अद्भु॑तो दा॒ता वाज॑स्य॒ गोम॑तः ॥ (२)
हे बलवान् अग्नि! तुम सत्यस्वरूप एवं महान् तथा गोयुक्त अन्न देने वाले हो. मुझे शत्रु सेनाओं को हराने वाला पुत्र दो. (२)
O agni! You are the ones of truth and of the great and the rich food. Give me the son who defeats enemy armies. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
विश्वे॒ हि त्वा॑ स॒जोष॑सो॒ जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः । होता॑रं॒ सद्म॑सु प्रि॒यं व्यन्ति॒ वार्या॑ पु॒रु ॥ (३)
हे अग्नि! परस्पर प्रसन्न एवं कुश बिछाने वाले सब ऋत्विज् यज्ञशाला में देवों को बुलाने वाले एवं सर्वप्रिय तुमसे उत्तम धन मांगते हैं. (३)
O agni! All those who are mutually happy and who are laying the kusha are the ones who call the gods in the yajnashala and the all-loving ask for the best money from you. (3)
ऋग्वेद (मंडल 5)
स हि ष्मा॑ वि॒श्वच॑र्षणिर॒भिमा॑ति॒ सहो॑ द॒धे । अग्न॑ ए॒षु क्षये॒ष्वा रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि ॥ (४)
हे अग्नि! वे विश्व-चर्षाण ऋषि शत्रुहिंसक बल धारण करें. हे तेजस्वी अग्नि! हमारे घरों में तुम धनयुक्त प्रकाश करो. हे पापनाशक अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर प्रकाश करो. (४)
O agni! They hold the force of the world-attraction sage enemy. O glorious agni! In our homes you make rich light. O sinful agni! You shine brightly. (4)