ऋग्वेद (मंडल 5)
समि॑द्धो अ॒ग्निर्दि॒वि शो॒चिर॑श्रेत्प्र॒त्यङ्ङु॒षस॑मुर्वि॒या वि भा॑ति । एति॒ प्राची॑ वि॒श्ववा॑रा॒ नमो॑भिर्दे॒वाँ ईळा॑ना ह॒विषा॑ घृ॒ताची॑ ॥ (१)
प्रज्वलित अग्नि दीप्तियुक्त आकाश में तेज फैलाते हैं एवं उषाकाल में विस्तृत होकर शोभा पाते हैं. स्तोत्रों द्वारा इंद्र आदि की प्रशंसा करती हुई, पुरोडाश आदि से युक्त खुच लेकर विश्ववारा पूर्वाभिमुख जाती हैं. (१)
The ignited agni spreads brightly in the bright sky and expands into the morning and adorns it. The hymns go to the east with the praises of Indra etc., taking a khuch containing purodash, etc. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
स॒मि॒ध्यमा॑नो अ॒मृत॑स्य राजसि ह॒विष्कृ॒ण्वन्तं॑ सचसे स्व॒स्तये॑ । विश्वं॒ स ध॑त्ते॒ द्रवि॑णं॒ यमिन्व॑स्याति॒थ्यम॑ग्ने॒ नि च॑ धत्त॒ इत्पु॒रः ॥ (२)
हे अग्नि! तुम प्रज्वलित होकर जल पर अधिकार करते हो एवं हव्यदाता यजमान के मंगल के लिए रक्षा करते हो. तुम जिस यजमान के पास जाते हो, वह सभी प्रकार की संपत्ति धारण करता है. वह तुम्हारे सामने तुम्हारे सत्कार योग्य हव्य को रखता है. (२)
O agni! You ignite and take possession of the water and protect the well-being of the human-giving host. The host you go to holds all kinds of property. He puts before you your hospitality worthy. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अग्ने॒ शर्ध॑ मह॒ते सौभ॑गाय॒ तव॑ द्यु॒म्नान्यु॑त्त॒मानि॑ सन्तु । सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॒मा कृ॑णुष्व शत्रूय॒ताम॒भि ति॑ष्ठा॒ महां॑सि ॥ (३)
हे अग्नि! हमें शोभन धन वाला बनाने के लिए हमारे शत्रुओं का नाश करो. तुम्हारा तेज उत्कृष्ट हो. तुम हम पति-पत्नी के संबंधों को नियमित एवं हमारे शत्रुओं के तेज को नष्ट करो. (३)
O agni! Destroy our enemies to make us rich. Yours fast be excellent. You let us regulate the relationship of husband and wife and destroy the brightness of our enemies. (3)
ऋग्वेद (मंडल 5)
समि॑द्धस्य॒ प्रम॑ह॒सोऽग्ने॒ वन्दे॒ तव॒ श्रिय॑म् । वृ॒ष॒भो द्यु॒म्नवा॑ँ असि॒ सम॑ध्व॒रेष्वि॑ध्यसे ॥ (४)
हे प्रज्वलित एवं परम तेजस्वी अग्नि! हम यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम कामवर्षी एवं धनवान् हो तथा यज्ञों में भली प्रकार प्रज्वलित होते हो. (४)
O blazing and the ultimate glorious agni! We host you to praise you. You are a workman and a rich man and are well lit up in the yagnas. (4)
ऋग्वेद (मंडल 5)
समि॑द्धो अग्न आहुत दे॒वान्य॑क्षि स्वध्वर । त्वं हि ह॑व्य॒वाळसि॑ ॥ (५)
हे यजमानों द्वारा बुलाए गए एवं शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर इंद्रादि देवों का हवन करो. तुम हव्य वहन करने वाले हो. (५)
O agni called by hosts and with shobhan yajna! You are well lit and do havan of indradi devas. You're going to bear the right. (5)
ऋग्वेद (मंडल 5)
आ जु॑होता दुव॒स्यता॒ग्निं प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे । वृ॒णी॒ध्वं ह॑व्य॒वाह॑नम् ॥ (६)
हे ऋत्विजो! तुम हमारा यज्ञ आरंभ होने पर हव्य ढोने वाले अग्नि में हवन करो, उनकी सेवा करो, उन्हें प्राप्त करो एवं अपना हव्य देवों के समीप पहुंचाने के लिए उन्हें वरण करो. (६)
Hey Ritvijo! When our yajna begins, do havan in the agni that carries the havan, serve them, receive them and select them to bring your vow to the gods. (6)