हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.31.11

मंडल 5 → सूक्त 31 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
सूर॑श्चि॒द्रथं॒ परि॑तक्म्यायां॒ पूर्वं॑ कर॒दुप॑रं जूजु॒वांस॑म् । भर॑च्च॒क्रमेत॑शः॒ सं रि॑णाति पु॒रो दध॑त्सनिष्यति॒ क्रतुं॑ नः ॥ (११)
इंद्र ने संग्राम में एतश ऋषि के साथ लड़ने वाले सूर्य का तेज चलने वाला रथ गतिहीन कर दिया था. एतश के कल्याण के लिए इंद्र ने पहले सूर्य के रथ का एक पहिया छीन लिया था. उसीसे इंद्र असुरों का नाश करते हैं. (११)
Indra had made the sun's fast-moving chariot motionless fighting with the sage Etash in the battle. For the welfare of Etash, Indra had earlier snatched a wheel of the chariot of the Sun. From this Indra destroys the asuras. (11)