हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.41.3

मंडल 5 → सूक्त 41 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
आ वां॒ येष्ठा॑श्विना हु॒वध्यै॒ वात॑स्य॒ पत्म॒न्रथ्य॑स्य पु॒ष्टौ । उ॒त वा॑ दि॒वो असु॑राय॒ मन्म॒ प्रान्धां॑सीव॒ यज्य॑वे भरध्वम् ॥ (३)
हे अभिलाषाओं का दमन करने वाले अश्विनीकुमारो! हम तुम्हें इस कारण पुकारते हैं कि अपना रथ वायु के समान वेग से चलाओ. हे ऋत्विजो! तुम ह्युतिशाली एवं प्राणहरण करने वाले रुद्र के लिए सुंदर स्तोत्र एवं हव्य अन्न तैयार करो. (३)
O Ashwinikumaro who suppresses desires! We call upon you because you should drive your chariot at the same speed as the wind. Hey Ritvijo! You prepare beautiful hymns and auspicious food for the mortal and soul-taking Rudra. (3)