ऋग्वेद (मंडल 5)
आ नो॑ दि॒वो बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दा सर॑स्वती यज॒ता ग॑न्तु य॒ज्ञम् । हवं॑ दे॒वी जु॑जुषा॒णा घृ॒ताची॑ श॒ग्मां नो॒ वाच॑मुश॒ती शृ॑णोतु ॥ (११)
यज्ञ की पात्र देवी सरस्वती द्युलोक अथवा विशाल अंतरिक्ष से यज्ञ में आवें. उदक-वर्षा करने वाली वह प्रसन्रतापूर्वक हमारी स्तुति को सुने और उसका अर्थ जाने. (११)
The character of the yajna should come to the yagna from goddess Saraswati Duloka or from a vast space. He who showers the belly should gladly listen to our praise and know its meaning. (11)