हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.43.14

मंडल 5 → सूक्त 43 → श्लोक 14 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 43
मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे शु॒क्र आ॒योर्वि॑प॒न्यवो॑ रास्पि॒रासो॑ अग्मन् । सु॒शेव्यं॒ नम॑सा रा॒तह॑व्याः॒ शिशुं॑ मृजन्त्या॒यवो॒ न वा॒से ॥ (१४)
यजमान के होता, हव्यपात्र उठाने वाले ऋत्विज्‌ मातारूपी धरती के विशाल एवं उज्ज्वल वेदीरूप स्थान पर बैठते हैं. सांसारिक लोग पैदा हुए बालक की शरीर वृद्धि के निमित्त जिस प्रकार उसकी मालिश करते हैं, उसी प्रकार उत्पन्न अग्नि का पोषण स्तुतियों से किया जाता है. (१४)
The host's, the people who lift the havanpatra sit in the vast and bright altar of the earth. Just as the worldly people massage a born child for his body growth, so the agni produced is nourished by praises. (14)