हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.43.15

मंडल 5 → सूक्त 43 → श्लोक 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 43
बृ॒हद्वयो॑ बृह॒ते तुभ्य॑मग्ने धिया॒जुरो॑ मिथु॒नासः॑ सचन्त । दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त् ॥ (१५)
हे महान्‌ अग्नि! यज्ञकर्म करते हुए बुढ़ापे को प्राप्त स्त्रीपुरुष तुम्हें अधिक मात्रा में अन्न भेंट करते हैं. सभी देव हमारे लिए शोभन आह्वान वाले हों. धरती माता हमें दुर्बुद्धि में न डाले. (१५)
O great agni! While performing the yajnakarma, the old man gifts you more food. May all the gods be the ones of adornment for us. Mother Earth should not let us be misunderstood. (15)