हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
तं प्र॒त्नथा॑ पू॒र्वथा॑ वि॒श्वथे॒मथा॑ ज्ये॒ष्ठता॑तिं बर्हि॒षदं॑ स्व॒र्विद॑म् । प्र॒ती॒ची॒नं वृ॒जनं॑ दोहसे गि॒राशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से ॥ (१)
हे अंतरात्मा! पुराने यजमान, हमारे पूर्वज, समस्त प्राणी एवं आधुनिक लोग जिस प्रकार देवों में श्रेष्ठ, कुश पर विराजने वाले, सर्वज्ञ, हमारे सामने उपस्थित, शक्तिशाली, शीघ्रगामी एवं सबको हराने वाले इंद्र की स्तुति करके सफल मनोरथ हुए थे, उसी प्रकार तुम भी बनो. (१)
O conscience! Just as the old hosts, our ancestors, all beings and modern people were successful by praising indra, the best of the gods, the one who ascended to kusha, the all-knowing, the one before us, the mighty, the quick and the defeater, so be you. (1)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
श्रि॒ये सु॒दृशी॒रुप॑रस्य॒ याः स्व॑र्वि॒रोच॑मानः क॒कुभा॑मचो॒दते॑ । सु॒गो॒पा अ॑सि॒ न दभा॑य सुक्रतो प॒रो मा॒याभि॑रृ॒त आ॑स॒ नाम॑ ते ॥ (२)
हे स्वर्ग में दीप्तिशाली इंद्र! गतिहीन-मेघ के भीतर के शोभन-जल को तुम सभी प्राणियों के हित के लिए समस्त दिशाओं में पहुंचाओ. हे शोभन-कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्राणियों के रक्षक बनो, उनकी हिंसा मत करो. तुम आसुरी मायाओं से परे हो, इसलिए सत्यलोक में तुम्हारा नाम है. (२)
O glorious Indra in heaven! Deliver the sobnothwater within the motionless cloud in all directions for the benefit of all you beings. O Indra, who does good deeds! You become the protector of beings, don't do their violence. You are beyond the asuri maya, so your name is in satyaloka. (2)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
अत्यं॑ ह॒विः स॑चते॒ सच्च॒ धातु॒ चारि॑ष्टगातुः॒ स होता॑ सहो॒भरिः॑ । प्र॒सर्स्रा॑णो॒ अनु॑ ब॒र्हिर्वृषा॒ शिशु॒र्मध्ये॒ युवा॒जरो॑ वि॒स्रुहा॑ हि॒तः ॥ (३)
अग्नि सत्य, फलसाधक एवं सबको धारण करने वाले हव्य को सदा स्वीकार करते हैं. अग्नि बाधाहीन गति वाले, होम-निष्पादक एवं शक्तिदाता हैं. वे कुशों पर बैठने वाले, वर्षाकारी, ओषधियों में स्थित, शिशु, युवा एवं जरारहित हैं. (३)
Fire always accepts the truth, the fruit-giver and the one who possesses all of them. Fires are non-barrier-prone, home-executing and power-giver. They are seated on the kushas, rain-fed, nestled, infantile, young and uninhibited. (3)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
प्र व॑ ए॒ते सु॒युजो॒ याम॑न्नि॒ष्टये॒ नीची॑र॒मुष्मै॑ य॒म्य॑ ऋता॒वृधः॑ । सु॒यन्तु॑भिः सर्वशा॒सैर॒भीशु॑भिः॒ क्रिवि॒र्नामा॑नि प्रव॒णे मु॑षायति ॥ (४)
यज्ञ में जाने की इच्छुक, निम्न गतिशील, यजमानों द्वारा प्राप्त करने योग्य, यज्ञ बढ़ाने वाली, शोभन गमनशील एवं सब पर शासन करने वाली किरणों द्वारा सूर्य निचले स्थान में भरे जल को चुराता है. (४)
The sun steals the water filled in the lower place by the rays that wish to go to the yagna, the low dynamic, the attainable by the hosts, the sacrificial enhancer, the adornment, the moving and the ruling over all. (4)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
सं॒जर्भु॑राण॒स्तरु॑भिः सुते॒गृभं॑ वया॒किनं॑ चि॒त्तग॑र्भासु सु॒स्वरुः॑ । धा॒र॒वा॒केष्वृ॑जुगाथ शोभसे॒ वर्ध॑स्व॒ पत्नी॑र॒भि जी॒वो अ॑ध्व॒रे ॥ (५)
हे शोभन स्तुतियों वाले अग्नि! लकड़ी के बने पात्र में रखे एवं निचोड़े हुए सोमरस को पीकर एवं मनोहर स्तुतियों को सुनकर जब तुम प्रसन्न होते हो, तब तुम ऋत्विजों से विशेष शोभा पाते हो. तुम यज्ञ में सबको जीवन देने वाली एवं सबका रक्षण करने वाली ज्वालाओं को बढ़ाओ. (५)
O agni with glorious praises! When you are pleased to drink the somras kept in a wooden vessel and listen to the beautiful hymns and squeezed, you get a special adornment from the ritvijas. You increase the flames that give life to all and protect everyone in the yajna. (5)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
या॒दृगे॒व ददृ॑शे ता॒दृगु॑च्यते॒ सं छा॒यया॑ दधिरे सि॒ध्रया॒प्स्वा । म॒हीम॒स्मभ्य॑मुरु॒षामु॒रु ज्रयो॑ बृ॒हत्सु॒वीर॒मन॑पच्युतं॒ सहः॑ ॥ (६)
यह समस्त देवों का समूह जैसा दिखाई देता है वैसा ही वर्णन किया जाता है. अभिलाषा पूर्ण करने वाली उस दीप्ति से वे जल में अपना रूप स्थिर करते हैं. वे महान्‌ एवं बहुत देने वाला धन महान्‌ वेग, वीरतायुक्त पुत्र एवं समाप्त न होने वाला बल दें. (६)
It is described as the group of all gods. With that glow that fulfills the desire, they stabilize their form in the water. They give great and very giving money, great speed, heroic sons and non-finished strength. (6)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
वेत्यग्रु॒र्जनि॑वा॒न्वा अति॒ स्पृधः॑ समर्य॒ता मन॑सा॒ सूर्यः॑ क॒विः । घ्रं॒सं रक्ष॑न्तं॒ परि॑ वि॒श्वतो॒ गय॑म॒स्माकं॒ शर्म॑ वनव॒त्स्वाव॑सुः ॥ (७)
सर्वज्ञ, असुरों के साथ युद्ध के इच्छुक, आगे चलने वाले, अपनी पत्नी उषा के साथ आगे बढ़ने के अभिलाषी एवं धन के स्वामी सूर्य हमारे लिए दीप्तिशाली एवं समस्त रक्षासाधनों वाला घर और संपूर्ण सुख दें. (७)
May the omniscient, willing to fight with the asuras, those who move forward, who desire to move forward with his wife Usha and the lord of wealth, may the Sun, give us a house with bright and all the protective means and complete happiness. (7)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
ज्यायां॑सम॒स्य य॒तुन॑स्य के॒तुन॑ ऋषिस्व॒रं च॑रति॒ यासु॒ नाम॑ ते । या॒दृश्मि॒न्धायि॒ तम॑प॒स्यया॑ विद॒द्य उ॑ स्व॒यं वह॑ते॒ सो अरं॑ करत् ॥ (८)
हे अतिशय वृद्ध ऋषियों द्वारा स्तुत एवं गमनशील सूर्य! जिन स्तुतियों में तुम्हारे प्रति श्रद्धा भाव है, तुम्हें प्रसिद्ध करने वाले कमों से युक्त उन स्तुतियों द्वारा यजमान तुम्हारी सेवा करते हैं. वे जिस बात की कामना करते हैं, उसे वास्तविक रूप से जान लेते हैं. अपनी इच्छा से तुम्हारी सेवा करने वाले पर्याप्त फल पाते हैं. (८)
O sun praised and moved by the most aged sages! The hosts serve you by those praises that have reverence for you, those praises containing those who make you famous. They really know what they want. Those who serve you of their own will get enough fruit. (8)
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