ऋग्वेद (मंडल 5)
श्रि॒ये सु॒दृशी॒रुप॑रस्य॒ याः स्व॑र्वि॒रोच॑मानः क॒कुभा॑मचो॒दते॑ । सु॒गो॒पा अ॑सि॒ न दभा॑य सुक्रतो प॒रो मा॒याभि॑रृ॒त आ॑स॒ नाम॑ ते ॥ (२)
हे स्वर्ग में दीप्तिशाली इंद्र! गतिहीन-मेघ के भीतर के शोभन-जल को तुम सभी प्राणियों के हित के लिए समस्त दिशाओं में पहुंचाओ. हे शोभन-कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्राणियों के रक्षक बनो, उनकी हिंसा मत करो. तुम आसुरी मायाओं से परे हो, इसलिए सत्यलोक में तुम्हारा नाम है. (२)
O glorious Indra in heaven! Deliver the sobnothwater within the motionless cloud in all directions for the benefit of all you beings. O Indra, who does good deeds! You become the protector of beings, don't do their violence. You are beyond the asuri maya, so your name is in satyaloka. (2)