हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.55.2

मंडल 5 → सूक्त 55 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 55
स्व॒यं द॑धिध्वे॒ तवि॑षीं॒ यथा॑ वि॒द बृ॒हन्म॑हान्त उर्वि॒या वि रा॑जथ । उ॒तान्तरि॑क्षं ममिरे॒ व्योज॑सा॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥ (२)
हे मरुतो! तुम्हारे ज्ञान की सामर्थ्य असीमित है. तुम स्वयं ही शक्ति धारण करते हो. हे महान्‌ मरुतो! तुम विस्तृतरूप से सुशोभित बनो एवं अपने तेज से आकाश को भर दो. मरुतों के रथ जल के पीछे चलते हैं. (२)
O Maruto! The power of your knowledge is unlimited. You own the power. O great Maruto! Be widely beautified and fill the sky with your brightness. The chariots of the maruts walk behind the water. (2)