ऋग्वेद (मंडल 5)
रथं॒ नु मारु॑तं व॒यं श्र॑व॒स्युमा हु॑वामहे । आ यस्मि॑न्त॒स्थौ सु॒रणा॑नि॒ बिभ्र॑ती॒ सचा॑ म॒रुत्सु॑ रोद॒सी ॥ (८)
हम लोग मरुतों के उस अन्नपूर्ण रथ का आह्वान करते हैं, जिस रथ में रमणीय जलों को धारण करने वाली मरुतों की माता बैठती है. (८)
We call upon the full chariot of the maruts, in which sits the mother of the maruts holding the delightful waters. (8)