हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
ईळे॑ अ॒ग्निं स्वव॑सं॒ नमो॑भिरि॒ह प्र॑स॒त्तो वि च॑यत्कृ॒तं नः॑ । रथै॑रिव॒ प्र भ॑रे वाज॒यद्भिः॑ प्रदक्षि॒णिन्म॒रुतां॒ स्तोम॑मृध्याम् ॥ (१)
मैं श्यावाश्व ऋषि के स्तोत्रों द्वारा उत्तम रक्षा करने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि यहां आकर मेरे यज्ञकर्म को जानें. लोग जिस प्रकार रथों की सहायता से इच्छित स्थान पर पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हम अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तोत्रों द्वारा अपना अभिमत पूरा करें. हम प्रदक्षिणा द्वारा मरुतों के समूह को बढ़ावें. (१)
I praise the agni that protects the best by the hymns of sage Shyavaswa. Fire come here and know my yajnakarma. Just as people reach the desired place with the help of chariots, so let us fulfill our opinion through complete hymns with the desire of food. We should increase the group of maruts by circumambulation. (1)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
आ ये त॒स्थुः पृष॑तीषु श्रु॒तासु॑ सु॒खेषु॑ रु॒द्रा म॒रुतो॒ रथे॑षु । वना॑ चिदुग्रा जिहते॒ नि वो॑ भि॒या पृ॑थि॒वी चि॑द्रेजते॒ पर्व॑तश्चित् ॥ (२)
हे रुद्रपुत्र मरुतो! तुम बुंदकियों वाली प्रसिद्ध घोड़ियों द्वारा खींचे जाते हुए एवं शोभन द्वारों वाले रथों पर बैठते हो. हे अधिक बलसंपन्न मरुतो! जब तुम रथों पर बैठते हो, तब तुम्हारे भय से वन, धरती एवं पर्वत कांपने लगते हैं. (२)
O Rudraputra Maruto! You sit on chariots with famous horses with bunks and adorned with gates. O more powerful Maruto! When you sit on the chariots, the forest, the earth and the mountains tremble because of your fear. (2)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
पर्व॑तश्चि॒न्महि॑ वृ॒द्धो बि॑भाय दि॒वश्चि॒त्सानु॑ रेजत स्व॒ने वः॑ । यत्क्रीळ॑थ मरुत ऋष्टि॒मन्त॒ आप॑ इव स॒ध्र्य॑ञ्चो धवध्वे ॥ (३)
हे मरुतो! जब तुम भयंकर शब्द करते हो, उस समय महान्‌ विस्तृत पर्वत भी डर जाते हैं एवं स्वर्ग के शिखर भी कांपने लगते हैं. हे मरुतो! जब तुम हाथों में आयुध लेकर क्रीड़ा करते हो, तब जलों के समान तेज दौड़ते हो. (३)
O Maruto! When you say terrible words, at that time the great wide mountains are also frightened and the peaks of heaven also begin to tremble. O Maruto! When you play with armament in your hands, you run as fast as the waters. (3)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
व॒रा इ॒वेद्रै॑व॒तासो॒ हिर॑ण्यैर॒भि स्व॒धाभि॑स्त॒न्वः॑ पिपिश्रे । श्रि॒ये श्रेयां॑सस्त॒वसो॒ रथे॑षु स॒त्रा महां॑सि चक्रिरे त॒नूषु॑ ॥ (४)
विवाह के योग्य धनी नवयुवक जिस तरह सोने के गहनों एवं जलों में स्नान द्वारा अपने शरीर को सुंदर बनाता है, उसी तरह सर्वश्रेष्ठ व शक्तिशाली मरुद्गण रथों पर एकत्रित होकर अपने शरीरों में महान्‌ शोभा धारण करते हैं. (४)
Just as the marriageable rich youth makes his body beautiful by bathing in gold ornaments and water, the best and powerful deserts gather on chariots and adorn their bodies greatly. (4)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
अ॒ज्ये॒ष्ठासो॒ अक॑निष्ठास ए॒ते सं भ्रात॑रो वावृधुः॒ सौभ॑गाय । युवा॑ पि॒ता स्वपा॑ रु॒द्र ए॑षां सु॒दुघा॒ पृश्निः॑ सु॒दिना॑ म॒रुद्भ्यः॑ ॥ (५)
समान शक्ति वाले मरुद्गण आपस में छोटे या बड़े नहीं हैं. वे सौभाग्य के लिए भ्रातृप्रेम के साथ बड़े हुए हैं. मरुतों के पिता रुद्र नित्य युवा एवं शोभन कर्मो वाले हैं. इनकी माता पृश्नि गाय के समान दुहने योग्य हैं. ये दोनों मरुतों को कल्याणकारी हों. (५)
Deserts with the same power are not small or large among themselves. They have grown up with fraternal love for good fortune. Rudra, the father of the maruts, is constantly young and a brave man. Their mother is as milky as a pristine cow. These two should be beneficial to the maruts. (5)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
यदु॑त्त॒मे म॑रुतो मध्य॒मे वा॒ यद्वा॑व॒मे सु॑भगासो दि॒वि ष्ठ । अतो॑ नो रुद्रा उ॒त वा॒ न्व१॒॑स्याग्ने॑ वि॒त्ताद्ध॒विषो॒ यद्यजा॑म ॥ (६)
हे मरुतो! तुम उत्तम, मध्यम एवं अधम स्वर्ग में रहते हो. हे रुद्रपुत्रो! इन तीनों स्थानों से हमारे पास आओ. हे अग्नि! हम जो हव्य तुम्हें दें, उसे तुम जानो. (६)
O Maruto! You live in the best, middle and low heaven. O rudraputras! Come to us from these three places. O agni! You know what we give you. (6)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
अ॒ग्निश्च॒ यन्म॑रुतो विश्ववेदसो दि॒वो वह॑ध्व॒ उत्त॑रा॒दधि॒ ष्णुभिः॑ । ते म॑न्दसा॒ना धुन॑यो रिशादसो वा॒मं ध॑त्त॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (७)
हे सर्वज्ञ मरुतो! तुम और अग्ने स्वर्ग के श्रेष्ठ भाग में शिखरों पर स्थित बनो. तुम हमारी स्तुतियों एवं हव्यों से प्रसन्न होकर हमारे शत्रुओं को डराओ तथा मार डालो. तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को संपत्ति दो. (७)
O omniscient Maruto! Be you and Agne located on the peaks in the superior part of heaven. Be pleased with our praises and our praises and words, and scare and kill our enemies. You give the property to the host squeezing the somras. (7)

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
अग्ने॑ म॒रुद्भिः॑ शु॒भय॑द्भि॒रृक्व॑भिः॒ सोमं॑ पिब मन्दसा॒नो ग॑ण॒श्रिभिः॑ । पा॒व॒केभि॑र्विश्वमि॒न्वेभि॑रा॒युभि॒र्वैश्वा॑नर प्र॒दिवा॑ के॒तुना॑ स॒जूः ॥ (८)
हे वैश्वानर अग्नि! तुम अपने पूर्ववर्ती ज्वालासमूह से युक्त होकर शोभासंपन्न, स्तुति- योग्य, समूहरूप में रहने वाले, पवित्र करने वाले, उन्नति के द्वारा प्रसन्न करने वाले एवं दीर्घ जीवनयुक्त मरुतों के साथ प्रसन्न बनो एवं सोमरस पिओ. (८)
O global agni! Be pleased with the maruts of long life, and drink the somras, and drink the somarah, and drink the somras, with the riches of adornment, worthy of the group, sanctifying, sanctifying, pleasing by advancement, and with long-lived maruts. (8)