ऋग्वेद (मंडल 5)
ते नो॒ वसू॑नि॒ काम्या॑ पुरुश्च॒न्द्रा रि॑शादसः । आ य॑ज्ञियासो ववृत्तन ॥ (१६)
हे शत्रुनाशक, यज्ञ के पात्र एवं प्रमुदितकारक धन वाले मरुतो! तुम लोगों को मनचाहा धन दो. (१६)
O enemies, the characters of yajna and the rich riches of the beloved, the marutos! Give you people the money you want. (16)