ऋग्वेद (मंडल 5)
आ यद्योनिं॑ हिर॒ण्ययं॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ सद॑थः । ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नां य॒न्तं सु॒म्नं रि॑शादसा ॥ (२)
हे मानवरक्षक एवं शत्रुनाशक मित्र व वरुण! तुम कल्याणकारी एवं रमणीय यज्ञभूमि में जब आते हो तो हमें सुख देते हो. (२)
O human protector and enemy-destroying friend and Varuna! When you come to the land of welfare and delightful yajna, you give us happiness. (2)