ऋग्वेद (मंडल 5)
मा कस्या॑द्भुतक्रतू य॒क्षं भु॑जेमा त॒नूभिः॑ । मा शेष॑सा॒ मा तन॑सा ॥ (४)
हे अदभुत कर्म करने वाले मित्र व वरुण! हम किसी के पवित्र धन का भी उपभोग न करें. तुम्हारी कृपा से हम स्वयं एवं हमारे पुत्र-पौत्र अन्य के धन पर न पलें. (४)
This wonderful friend and Varun! We should not consume anyone's holy wealth. By your grace, let us not bring ourselves and our sons and grandsons to the wealth of others. (4)