ऋग्वेद (मंडल 5)
आ नो॑ गन्तं रिशादसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ ब॒र्हणा॑ । उपे॒मं चारु॑मध्व॒रम् ॥ (१)
हे शत्रुनाशक एवं शन्रुप्रेरक मित्र व वरुण! तुम हमारे इस अहिंसक यज्ञ में आओ. (१)
O enemies and enemies, inspiring friends and Varuna! You come to this non-violent yagna of ours. (1)