ऋग्वेद (मंडल 5)
हिर॑ण्यत्व॒ङ्मधु॑वर्णो घृ॒तस्नुः॒ पृक्षो॒ वह॒न्ना रथो॑ वर्तते वाम् । मनो॑जवा अश्विना॒ वात॑रंहा॒ येना॑तिया॒थो दु॑रि॒तानि॒ विश्वा॑ ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा सोने से मढ़ा हुआ, आकर्षक रंग वाला, जल बरसाने वाला, मन के समान शीघ्रगामी एवं वायु के सदृश चलने वाला रथ अन्न धारण करके आता है. उस रथ द्वारा तुम सभी दुर्गम मार्गो को पार करते हो. (३)
O Ashwinikumaro! Your gold-plated, attractive-colored, water-pouring, fast-moving and wind-like chariot like a mind comes wearing food. By that chariot you cross all the inaccessible paths. (3)