हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.77.4

मंडल 5 → सूक्त 77 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
यो भूयि॑ष्ठं॒ नास॑त्याभ्यां वि॒वेष॒ चनि॑ष्ठं पि॒त्वो रर॑ते विभा॒गे । स तो॒कम॑स्य पीपर॒च्छमी॑भि॒रनू॑र्ध्वभासः॒ सद॒मित्तु॑तुर्यात् ॥ (४)
जो यजमान यज्ञ का हव्य विभक्त करते समय अश्चिनीकुमारों को अधिक अन्न देता है, वह यज्ञकर्मो द्वारा अपनी संतान का पालन करता है. अग्नि अप्रज्वलित रहने पर सदा हिंसा करते हैं. (४)
The host who gives more food to the Ashchinikumaras while dividing the yagna, follows his offspring through yajnakarmo. Fires perpetually commit violence when they remain unexplored. (4)