ऋग्वेद (मंडल 5)
अ॒द्वे॒षो नो॑ मरुतो गा॒तुमेत॑न॒ श्रोता॒ हवं॑ जरि॒तुरे॑व॒याम॑रुत् । विष्णो॑र्म॒हः स॑मन्यवो युयोतन॒ स्मद्र॒थ्यो॒३॒॑ न दं॒सनाप॒ द्वेषां॑सि सनु॒तः ॥ (८)
हे द्वेषरहित मरुतो! तुम स्तोता एवं एवयामरुत् के गतिशील स्तोत्र को सुनने हेतु आओ और उसे सुनो. हे विष्णु के साथ यज्ञभाग पाने वाले मरुतो! योद्धा जिस प्रकार शत्रुओं को भगाता है, उसी प्रकार तुम हमारे मन में छिपे पापों को दूर करो. (८)
O hatred-less maruto! You come to listen to the dynamic hymns of the devotees and the Avyamaruta. O Maruto who has attained the yagya with Vishnu! Just as the warrior drives away the enemies, so you remove the misdeeds hidden in our minds. (8)