ऋग्वेद (मंडल 6)
यस्ते॑ सूनो सहसो गी॒र्भिरु॒क्थैर्य॒ज्ञैर्मर्तो॒ निशि॑तिं वे॒द्यान॑ट् । विश्वं॒ स दे॑व॒ प्रति॒ वार॑मग्ने ध॒त्ते धा॒न्यं१॒॑ पत्य॑ते वस॒व्यैः॑ ॥ (४)
हे बलपुत्र अग्नि देव! जो यजमान स्तुति वचनों, स्तोत्रों एवं यज्ञसाधनों द्वारा यज्ञवेदी में तुम्हारा तीक्ष्ण प्रकाश पहुंचाता है, वह पर्याप्त अन्न धारण करता है तथा संपत्तियों को पाता है. (४)
O son of power, God of agni! The host who brings your sharp light to the yajna-vedi through praise words, hymns and sacrificial means, holds enough food and finds the possessions. (4)