ऋग्वेद (मंडल 6)
अग्न॒ आ या॑हि वी॒तये॑ गृणा॒नो ह॒व्यदा॑तये । नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषि॑ ॥ (१०)
हे अग्नि! देवों को हव्य देने के लिए तुम्हारी स्तुति की जा रही है. तुम हव्य भक्षण के लिए आओ एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१०)
O agni! You are being praised for giving a greeting to the gods. You come to eat the havya and sit on the bedding. (10)