ऋग्वेद (मंडल 6)
क्रत्वा॒ दा अ॑स्तु॒ श्रेष्ठो॒ऽद्य त्वा॑ व॒न्वन्सु॒रेक्णाः॑ । मर्त॑ आनाश सुवृ॒क्तिम् ॥ (२६)
हे अग्नि! यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारी सेवा करने वाला यजमान श्रेष्ठ एवं शोभन धन वाला हो तथा सदा तुम्हारी स्तुति करता रहे. (२६)
O agni! May the host who serves you through yajnakarma be the best and the one with riches and may he praise you forever. (26)