ऋग्वेद (मंडल 6)
वस्वी॑ ते अग्ने॒ संदृ॑ष्टिरिषय॒ते मर्त्या॑य । ऊर्जो॑ नपाद॒मृत॑स्य ॥ (२५)
हे बलपुत्र एवं मरणरहित अग्नि! तुम्हारा प्रशंसायोग्य तेज यजमान को अन्न देता है. (२५)
O son of strength and a agni without death! Your praiseworthy fast gives food to the host. (25)