हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
क॒दा भु॑व॒न्रथ॑क्षयाणि॒ ब्रह्म॑ क॒दा स्तो॒त्रे स॑हस्रपो॒ष्यं॑ दाः । क॒दा स्तोमं॑ वासयोऽस्य रा॒या क॒दा धियः॑ करसि॒ वाज॑रत्नाः ॥ (१)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां तुम्हें पाकर कब रथ पर चढ़ेंगी? मुझ स्तोता को तुम हजार लोगों का पोषण करने वाली गाएं कब दोगे? मेरे स्तोत्रों को धन से युक्त कब करोगे? तुम यज्ञकर्मो को अन्न से सुशोभित कब करोगे? (१)
O Indra! When will our praises come to you and climb the chariot? When will you give me the hymns that nourish you thousand people? When will you make my hymns rich? When will you beautify the yajnakarma with food? (1)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
कर्हि॑ स्वि॒त्तदि॑न्द्र॒ यन्नृभि॒र्नॄन्वी॒रैर्वी॒रान्नी॒ळया॑से॒ जया॒जीन् । त्रि॒धातु॒ गा अधि॑ जयासि॒ गोष्विन्द्र॑ द्यु॒म्नं स्व॑र्वद्धेह्य॒स्मे ॥ (२)
हे इंद्र! तुम हमारे सैनिकों को शत्रु सैनिकों एवं हमारी संतान को शत्रुसंतान के साथ कब भिड़ाओगे तथा युद्ध में शत्रुओं को कब जीतोगे? तुम शत्रुओं की दूध, दही एवं घी देने वाली गायों को अधिक संख्या में कब जीतोगे? हे इंद्र! तुम हमें व्याप्त धन कब दोगे? (२)
O Indra! When will you fight our soldiers with the enemy soldiers and our children with the enemy, and when will you win the enemies in the war? When will you win more number of cows that give milk, curd and ghee to the enemies? O Indra! When will you give us the money? (2)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
कर्हि॑ स्वि॒त्तदि॑न्द्र॒ यज्ज॑रि॒त्रे वि॒श्वप्सु॒ ब्रह्म॑ कृ॒णवः॑ शविष्ठ । क॒दा धियो॒ न नि॒युतो॑ युवासे क॒दा गोम॑घा॒ हव॑नानि गच्छाः ॥ (३)
हे अतिशय बलवान्‌ इंद्र! तुम स्तुतिकर्ता को सभी प्रकार का अन्न कब दोगे? तुम यज्ञकर्मो एवं स्तुतियों को अपने में कब मिलाओगे? तुम स्तोत्रों को गाय देने वाला कब बनाओगे? (३)
O very strong Indra! When will you give all kinds of food to the praiseor? When will you mix the yajnakarmas and the praises in you? When will you make the psalms cow-givers? (3)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
स गोम॑घा जरि॒त्रे अश्व॑श्चन्द्रा॒ वाज॑श्रवसो॒ अधि॑ धेहि॒ पृक्षः॑ । पी॒पि॒हीषः॑ सु॒दुघा॑मिन्द्र धे॒नुं भ॒रद्वा॑जेषु सु॒रुचो॑ रुरुच्याः ॥ (४)
हे इंद्र! हम स्तुति करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों को गाएं देने वाला एवं शक्तिशाली घोड़ों से युक्त प्रसिद्ध अन्न दो. तुम अन्नों तथा सरलता से दुही जाती गायों को हमें दो एवं उन्हें दीप्त बनाओ. (४)
O Indra! We give the famous grain of praise to the rich sages who sing and contain powerful horses. You give us the grains and the cows that are easily milked and make them bright. (4)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
तमा नू॒नं वृ॒जन॑म॒न्यथा॑ चि॒च्छूरो॒ यच्छ॑क्र॒ वि दुरो॑ गृणी॒षे । मा निर॑रं शुक्र॒दुघ॑स्य धे॒नोरा॑ङ्गिर॒सान्ब्रह्म॑णा विप्र जिन्व ॥ (५)
हे इंद्र! तुम हमारे शत्रु को मृत्यु से मिलाओ. हे शूर एवं शत्रुहंता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे श्वेत दूध देने वाली गो के दाता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुतियों से कभी रुके नहीं. हे बुद्धिमान्‌ इंद्र! अंगिरागोत्र वालों को अन्न से तृप्त करो. (५)
O Indra! You meet our enemy with death. O Brave and enemy Indra! We praise you. O Indra, the giver of white milk-giving cow! We have never stopped by your praises. O wise Indra! Satisfy the people of The Angiragotra with food. (5)