हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 6.44.5

मंडल 6 → सूक्त 44 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
यं व॒र्धय॒न्तीद्गिरः॒ पतिं॑ तु॒रस्य॒ राध॑सः । तमिन्न्व॑स्य॒ रोद॑सी दे॒वी शुष्मं॑ सपर्यतः ॥ (५)
इंद्र संबंधी स्तुतियों द्वारा इंद्र का शत्रुधनहर्ता बल बढ़ता है. दिव्य धरती-आकाश उसी बल की सेवा करते हैं. (५)
Indra's enemy strength increases through the praises of Indra. The divine earth-sky serve the same force. (5)