ऋग्वेद (मंडल 6)
तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रवः॑ । बृ॒बुं स॑हस्र॒दात॑मं सू॒रिं स॑हस्र॒सात॑मम् ॥ (३३)
हम स्तोता सदा उन्हीं श्रेष्ठ बृबु की स्तुति करते हैं. वे हमें हजार गाएं देने वाले, विद्वान् एवं हजारों स्तुतियों के पात्र हैं. (३३)
We always praise the same best of the saints. They give us a thousand songs, scholars and deserve thousands of praises. (33)