ऋग्वेद (मंडल 6)
य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से । प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम् ॥ (१)
हे स्तोताओ! तुम सभी यज्ञो में प्रवृद्ध अग्नि की स्तोत्रों द्वारा बार-बार प्रशंसा करो. हम मरणरहित, जातवेद व मित्र के समान प्रिय अग्नि की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१)
This stotao! Praise the agni that is infested in all of you yajnas again and again with hymns. We repeatedly admire the mortal, the beloved agni like the JataVeda and the friend. (1)
ऋग्वेद (मंडल 6)
ऊ॒र्जो नपा॑तं॒ स हि॒नायम॑स्म॒युर्दाशे॑म ह॒व्यदा॑तये । भुव॒द्वाजे॑ष्ववि॒ता भुव॑द्वृ॒ध उ॒त त्रा॒ता त॒नूना॑म् ॥ (२)
हम अपने ऊपर वास्तव में प्रसन्न एवं बलपुत्र अग्नि की प्रशंसा करते हैं. देवों के लिए हव्यवहन करने वाले अग्नि को हम हव्य देते हैं. अग्नि युद्ध में हमारे रक्षक, उन्नतिकारक एवं हमारे पुत्रों के त्राणकर्ता हों. (२)
We are truly pleased with us and admire the strong son of agni. We give a vow to the agni that is meant for the gods. Let our protectors, progressives and troublemakers of our sons be in the agni war. (2)
ऋग्वेद (मंडल 6)
वृषा॒ ह्य॑ग्ने अ॒जरो॑ म॒हान्वि॒भास्य॒र्चिषा॑ । अज॑स्रेण शो॒चिषा॒ शोशु॑चच्छुचे सुदी॒तिभिः॒ सु दी॑दिहि ॥ (३)
हे अभिलाषापूरक, जरारहित एवं महान् अग्नि! तुम दीप्ति से प्रकाशित होते हो. हे तेजस्वी एवं नित्यदीप्ति से दीप्तियुक्त अग्नि! तुम अपनी शोभन दीप्तियों द्वारा हमें प्रकाशित करो. (३)
O willful, without a lot of desire and a great agni! You are illuminated by the glow. O glorious and glorious agni! You publish to us by your shobhan lamps. (3)
ऋग्वेद (मंडल 6)
म॒हो दे॒वान्यज॑सि॒ यक्ष्या॑नु॒षक्तव॒ क्रत्वो॒त दं॒सना॑ । अ॒र्वाचः॑ सीं कृणुह्य॒ग्नेऽव॑से॒ रास्व॒ वाजो॒त वं॑स्व ॥ (४)
हे अग्नि! तुम महान् देवों का यज्ञ करने वाले हो, इसलिए हमारे यज्ञ में भी देवों की सतत पूजा करो तथा हमारी रक्षा के लिए देवों को हमारे सामने लाओ. तुम हमें हव्य अन्न दो एवं हमारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करो. (४)
O agni! You are the ones who perform the yajna of the great gods, so worship the gods continuously even in our yajna and bring the gods before us to protect us. You give us the good food and accept the gift given to us. (4)
ऋग्वेद (मंडल 6)
यमापो॒ अद्र॑यो॒ वना॒ गर्भ॑मृ॒तस्य॒ पिप्र॑ति । सह॑सा॒ यो म॑थि॒तो जाय॑ते॒ नृभिः॑ पृथि॒व्या अधि॒ सान॑वि ॥ (५)
हे यज्ञ के गर्भ अग्नि! जल, पत्थर एवं अरणि रूप काष्ठ तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. तुम मनुष्यों द्वारा बलपूर्वक मथे जाते हो एवं धरती के उच्च स्थान में प्रकट होते हो. (५)
O garbha agni of yajna! Wood in the form of water, stone and agniwood make you powerful. You are forced by men and appear in the higher place of the earth. (5)
ऋग्वेद (मंडल 6)
आ यः प॒प्रौ भा॒नुना॒ रोद॑सी उ॒भे धू॒मेन॑ धावते दि॒वि । ति॒रस्तमो॑ ददृश॒ ऊर्म्या॒स्वा श्या॒वास्व॑रु॒षो वृषा श्या॒वा अ॑रु॒षो वृषा॑ ॥ (६)
जो अग्नि अपनी दीप्ति से धरती-आकाश को पूर्ण करते हैं, धुएं के साथ आकाश में दौड़ते हैं, वे ही दीप्तिसंपन्न एवं अभिलाषापूरक अग्नि काली रातों में अंधकार मिटाते हुए देखे जाते हैं. वे ही अग्ने रात्रियों के ऊपर स्थित हैं. (६)
The agnis that complete the earth and the sky with their brightness, run in the sky with smoke, are the ones who are seen to remove the darkness in the bright and desireful agni black nights. They are located above the nights. (6)
ऋग्वेद (मंडल 6)
बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभिः॑ शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑ । भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि ॥ (७)
हे अतिशय युवा एवं दीप्तियुक्त अग्नि देव! तुम भरद्वाज द्वारा प्रज्वलित होकर अपनी विशाल किरणों द्वारा हमारे लिए धन दो एवं जलो. हे शुद्ध करने वाले अग्नि! तुम जलो. (७)
O god of the most young and radiant agni! You are ignited by the flood, and give us wealth and burn by your huge rays. O cleansing agni! You burn. (7)
ऋग्वेद (मंडल 6)
विश्वा॑सां गृ॒हप॑तिर्वि॒शाम॑सि॒ त्वम॑ग्ने॒ मानु॑षीणाम् । श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ पा॒ह्यंह॑सः समे॒द्धारं॑ श॒तं हिमाः॑ स्तो॒तृभ्यो॒ ये च॒ दद॑ति ॥ (८)
हे अग्नि! तुम समस्त मानव प्रजाओं के गृहपति हो. हे अतिशय युवा अग्नि! मैं तुम्हें सौ वर्ष तक प्रज्वलित रखूंगा. तुम अपने सैकड़ों रक्षा साधनों द्वारा मुझे तथा हव्य देने वाले स्तोताओं को पाप से बचाओ. (८)
O agni! You are the homelord of all human beings. O very young agni! I'll keep you ignited for a hundred years. You save me and the hymns who give you the greetings from sin through your hundreds of defense tools. (8)