हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 6.48.2

मंडल 6 → सूक्त 48 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
ऊ॒र्जो नपा॑तं॒ स हि॒नायम॑स्म॒युर्दाशे॑म ह॒व्यदा॑तये । भुव॒द्वाजे॑ष्ववि॒ता भुव॑द्वृ॒ध उ॒त त्रा॒ता त॒नूना॑म् ॥ (२)
हम अपने ऊपर वास्तव में प्रसन्न एवं बलपुत्र अग्नि की प्रशंसा करते हैं. देवों के लिए हव्यवहन करने वाले अग्नि को हम हव्य देते हैं. अग्नि युद्ध में हमारे रक्षक, उन्नतिकारक एवं हमारे पुत्रों के त्राणकर्ता हों. (२)
We are truly pleased with us and admire the strong son of agni. We give a vow to the agni that is meant for the gods. Let our protectors, progressives and troublemakers of our sons be in the agni war. (2)