हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 6.48.15

मंडल 6 → सूक्त 48 → श्लोक 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
त्वे॒षं शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वण्य॑न॒र्वाणं॑ पू॒षणं॒ सं यथा॑ श॒ता । सं स॒हस्रा॒ कारि॑षच्चर्ष॒णिभ्य॒ आँ आ॒विर्गू॒ळ्हा वसू॑ करत्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ करत् ॥ (१५)
मैं शत्रुओं द्वारा अपराजेय एवं पोषक मरुद्बल की इसलिए स्तुति करता हूं कि वे मुझे एक साथ ही हजारों प्रकार की संपत्तियां दें. मरुद्गण छिपा हुआ धन हमारे लिए प्रकट करें एवं हमें धन का ज्ञान करावें. (१५)
I praise the invincible and nourishing deserts by the enemies for giving me thousands of kinds of properties at the same time. Let the deserts reveal the hidden wealth to us and make us know the wealth. (15)