ऋग्वेद (मंडल 6)
दृते॑रिव तेऽवृ॒कम॑स्तु स॒ख्यम् । अच्छि॑द्रस्य दध॒न्वतः॒ सुपू॑र्णस्य दध॒न्वतः॑ ॥ (१८)
हे पूषा! तुम्हारी मित्रता दही से भरे हुए एवं छिद्ररहित चर्मपात्र के समान बाधारहित हो. (१८)
O God! May your friendship be as seamless as that of a curd-filled and porous skin pot. (18)