ऋग्वेद (मंडल 6)
नम॒ इदु॒ग्रं नम॒ आ वि॑वासे॒ नमो॑ दाधार पृथि॒वीमु॒त द्याम् । नमो॑ दे॒वेभ्यो॒ नम॑ ईश एषां कृ॒तं चि॒देनो॒ नम॒सा वि॑वासे ॥ (८)
नमस्कार सबसे बढ़कर है. इसी कारण मैं नमस्कार करता हूं. नमस्कार ने ही धरती और स्वर्ग को धारण किया है. देवों को नमस्कार है. नमस्कार इन देवों का स्वामी है. मैं नमस्कार द्वारा पापों को दूर करता हूं. (८)
Hello is the most. That's why I greet. It is the salutation that holds the earth and the heaven. Greetings to the gods. Greetings are the lord of these gods. I remove sins by greetings. (8)